अमन कुमार
पं. पद्मसिंह शर्मा का जन्म सन् 1876 ई. दिन रविवार फाल्गुन सुदी 12 संवत 1933 वि. जिले के कुवैती चांदपुर स्याऊ रेलवे स्टेशन से चार कोस उत्तर की ओर नायक नंगला नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। इनके पिता श्री उमराव सिंह गाँव के मुखिया , प्रतिष्ठित ,
परोपकारी एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। इनका एक छोटा भाई था जिसका नाम था श्री रिसाल सिंह। वे
1931 ई. पूर्व से ही मृतक हो गये थे। पं. पद्मसिंह शर्मा की तीन संतानें। इनमें से सबसे बड़ी बेटी थी आनंदी देवी , उनके छोटे बेटे का नाम श्री काशीनाथ था और सबसे छोटे बेटे का नाम मीरा शर्मा था। पं. पद्मसिंह शर्मा के पिता आर्य समाजी अलगाव के थे। स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रति उनकी अत्यंत श्रद्धा थी। इसी कारण उनकी रुचि विशेष रूप से संस्कृत की ओर हुई। अन्यत्र की कृपा से अन्यत्र कई स्थानों पर स्वतंत्र रूप से संस्कृत का अध्ययन किया गया। जब ये 10-11
साल के थे तो आपके पिताश्री से ही अक्षराभ्यास हुआ। फिर मकान पर कई पंडित शिक्षकों ने संस्कृत में सारस्वत , कौमुदी , और रघुवंश आदि की पढ़ाई की और एक मौलवी साहब से उर्दू व फ़ारसी की भी शिक्षा ली। सन् 1894 ई. कुछ दिनों में स्वर्गीय भीमसेन शर्मा रेजिडेंट की प्रयाग स्थिति पाठशाला में अष्टाध्यायी पढ़ी। उसके बाद काशी के व्यापारियों ने अध्ययन किया। रिबूट , लाहौर ,
जालंधर ,
ताजपुर (बिजनौर) आदि स्थानों पर भी अध्ययन किया गया। अध्ययन के अंत का सन् 1904 ई. गुरुकुल काँगड़ी में कुछ दिन अध्यापन कार्य किया गया। उन दिनों वहाँ पं. भीमसेन और आचार्य पं. गंगादत्त भी थे। उसी समय महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) ने पं. रुद्रदत्त जी के संपादकत्व में हरिद्वार से सत्यवादी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन। उस समय पं. पद्मसिंह शर्मा भी अपने विशेष विभाग में थे। इनमें से संपादन एवं लेखन का प्रारंभ अंत से हुआ। इसके बाद शर्मा जी का जीवन लेखन , संपादन एवं अध्याय आदि में ही रहस्योद्घाटन हुआ। प्रारम्भ में ' सत्यवादी '
में ही अनेक ग्रन्थ लिखे गये। इसके बाद सन् 1908 के प्रारंभ में जब आचार्य गंगादत्त गुरुकुल काँगड़ी मुक्त आश्रम में रह रहे थे तो शर्मा जी ' परापेकरी ' ( मासिक) पत्रिका के ' संपादक ' वैदिक यंत्रालय में चले गए। वहां पर ' परोपकारी '
के साथ ही कुछ दिन तक ' अनाथ रक्षणं ' का भी संपादन किया गया। सन् 1909 ई. उनका आगमन जहाज़पुर कॉलेज में हुआ। यहां अन्य ' भारतोदय ' ( कॉलेज का मुखपत्र , मासिक) का संपादन एवं साथ ही अध्ययन कार्य भी किया गया है। सन् 1911ई. कॉलेज प्रबंधन समिति के मंत्री पद पर भी कार्य किया। इस प्रकार महाविद्यालयों की अविरल सेवाएँ जारी हैं। इन संपादकों में से एक ' भारतोदय '
पत्रिका ने प्रचुर मात्रा में प्रतिष्ठा प्राप्त की। सन् 1927 में एक पिता जी का देहान्त हो गया। इस कारण से एंजेल्स ने घर जाना छोड़ दिया।
अलगाव के बाद श्रीयुत शिवप्रसाद गुप्त के आश्रय पर ये ज्ञान मंडल में चले गए। सन् 1920 को संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में शामिल किया गया। इसी वर्ष उनकी माता जी का देहांत हो गया था। सन् 1922 ई. इसी क्रम में ' बिहारी सतसई ' को मंगलाप्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 1928 में सिद्धार्थ अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का स्मारक (बिहार) में प्रदर्शन किया गया। इसी वर्ष वर्ष समकक्ष गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर पद पर भी काम किया।
सन् 1911 ई. में ' प ù पैरा ' और ' प्रशासन मंजरी ' का प्रकाशन हुआ। एक बार ये संग्रहणी रोग से ग्रसित हो गया तो हरदुआगंज लाया गया , साथ में इनके पुत्र काशीनाथ शर्मा भी थे। जब वहां पर चिकित्सा से कोई लाभ नहीं हुआ तो तिरछा अपमान किया गया। वहाँ पर. गंगोली महोत्सवपानी की चिकित्सा मित्रवत। ऐसे राज्य में भी अविरत रूप से वैज्ञानिक वैज्ञानिक सेवा की। उस समय भी ऐसा कोई दिन नहीं था जिसमें ये दस-पंद्रह चिट्ठियाँ अपने दोस्तों को न हो (उस समय सेवा के लिए कवि ' शंकर ' ( पं. नाथूराम शर्मा के पुत्र) इनके पास थे) और इनके पास भी बड़े-बड़े साथियों की चिट्ठियाँ रोज़ आती थीं। उनके उत्तर ये अपनी भाषा में ही दिलवाते थे। मास तक युसुकी चिकित्सा चलती रही। कोई लाभ न होने पर एलेक्जेंड्रा एलाजापुर में एक की इच्छा प्रकट होने की ओर कहा गया- ' चलो कॉलेज चलो , मरना तो है ही , उसी पुण्य भूमि में प्राण त्याग दूँगा ,
गंगा के भगवान में। ' मूलतः यह स्पष्ट है कि कॉलेज के प्रति उनमें आत्मीयता और श्रद्धा का भाव था। उन्हें लाया गया , साथ में पं. भीमसेन शर्मा भी थे। उस समय कॉलेज में श्री विश्वनाथ मुख्याधिष्ठाता थे। यहां आएं पर पं. हरिशंकर शर्मा वैद्यराज की पहली पुड़िया से ही बहुत लाभ हुआ और ये बाईस-बाईस दिन में ही पूर्ण स्वस्थ हो गए।
पं. पद्मसिंह शर्मा को पाँचवीं बातें बहुत पसंद थीं- 1. स्वाध्याय , 2. नवीन लेखकों को प्रोत्साहन , 3. शास्त्रियों से मिलना-जुलना , 4.
अतिथि सत्कार , 5. मित्रमंडली के साथ यात्रा।
वे साहित्यिक यात्रा बहुत करते थे। अपनी मृत्यु से पूर्व भी उनका
विचार श्रावण में ब्रज की यात्रा करने का था। उनका कहना था-‘भाई अब की बार
श्रावण में ब्रज की यात्रा करनी चाहिए। आगरे के मिश्र भी साथ हों, कलकत्ते
से बनारसीदास जी तथा श्रीराम जी को भी बुलाया जाए। किंतु इस साहित्यिक यात्रा से
पूर्व ही वे जीवन की अंतिम यात्रा पर निकल पड़े।
कविजी (पं. नाथूराम शर्मा) के साथ उनके घनिष्ठ सम्बंध थे। कवि जी ने
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘अनुराग रत्न’ लिखी और उसका समर्पण काव्य कानन केसरी
पं. पद्मसिंह को ही किया जबकि एक सज्जन उन्हें इसके लिए पाँच हजार रुपए देने को
तैयार थे। उन सज्जन के कहने पर उनका कहना था कि-मैं अपना प्रचुर परिश्रम एक कलाविद
को ही अर्पण करूँगा और मेरी राय में पं. पद्मसिंह शर्मा इसके लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।
हिंदी जगत में ‘भारतोदय’
‘भारतोदय’ का प्रारंभ सन् 1909 ई. (ज्येष्ठ शुक्ल सं. 1966) में
हुआ था। इसके संपादक, पद्मसिंह शर्मा और सहायक संपादक पं. नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ थे। इसे
पं. शंकरदत्त शर्मा ने अपने प्रेस ‘धर्मदिवाकर प्रेस’ मुरादाबाद
में छापा और पं. भीमसेन शर्मा ने गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से प्रकाशित किया।
इसका वार्षिक मूल्य डेढ़ रुपए तथा विद्यार्थियों के लिए एक रुपया था। यह गुरुकुल
महाविद्यालय ज्वालापुर का ‘मासिक पत्र’ घोषित किया गया।
पत्रिका के आवरण पर सबसे ऊपर सूचना दी गई थी कि ‘‘अगली
संख्या में कविवर ‘शंकर’ की मजेदार कविता ‘अंधेर खाता’ छपेगी’’ तत्पश्चात
एक आकर्षक बार्डर और फिर ।।ओ3म।। के बाद आकर्षक साज-सज्जा के साथ
लिखा गया था ‘भारतोदय’। पत्रिका के शीर्षक के नीचे ध्येय स्पष्ट किया गया था-
‘‘निशम्यतां लेखललाम संचय, प्रकाशने येन कृतोऽतिनिश्चयः।
गृहीतसद्धर्मविशेषसंशय, श्वकास्तिसोयंभुवि ‘भारतोदयः’’।।
‘भारतोदय’ के नियम इस प्रकार बनाए गए -
1. यह पत्र प्रतिमास गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से प्रकाशित होता
है।
2. उसका वार्षिक मूल्य सर्वसाधारण से डेढ़ रुपए लिया जाएगा।
विद्यार्थियोें को एक रुपया में और महाविद्यालय के सभासदों को मुफ्त, पुस्तकालयों
और असमर्थ विद्यारसिकों को डाकव्यय लेकर।
3. पत्र का मुख्य उद्देश्य महाविद्यालय ज्वालापुर को लोकप्रिय बनाना तथा
तत्सम्बंधी समाचारों को प्रकाशित करना होगा।
इसमें धार्मिक, सामाजिक और शिक्षा सम्बंधी तथा लोकोपयोगी लेख रहा करेंगे, हिंदी
साहित्य का सुधार भी इसका लक्ष्य होगा। किसी मत, जाति या व्यक्ति
पर कोई असभ्य, अरुंतुद या कलहात्मक लेख इसमें प्रकाशित न होंगे।
4. बाहर से आये लेखों में काट छांट और न्यूनाधिक करने का पूरा अधिकार
संपादक को रहेगा।
5. समालोचना की पुस्तकें, बदले के पत्र, लेख, संपादक
के नाम आने चाहिए और पत्र न पहुंचने की सूचनाएं, ग्राहक होने की
दरख्वास्तें, मूल्य आदि, प्रकाशक अथवा प्रबंधकर्ता ‘भारतोदय’
के
नाम।
6. पत्र में किसी प्रकार के असभ्य और धोखा देनेवाले विज्ञापन नहीं
छपेंगे न तकसीम होंगे, ऐसे महाशयों को यह बात ध्यान में रखकर प्रार्थना करनी चाहिए। सब
प्रकार का पत्रव्यवहार महाविद्यालय ज्वालापुर जिला सहारनपुर, इस
पते पर होना चाहिए।
‘भारतोदय’ के प्रथम अंक के पृष्ठ संख्या 33 पर ‘‘भारतोदय
की उदयकथा’’ शीर्षक से भी जानकारी दी गई है-
महाविद्यालय के सम्बंध में एक पत्र की आवश्यकता का अनुभव करके कमेटी
के एक विशेष अधिवेशन में निश्चित हुआ कि विद्यालय की ओर से एक मासिक पत्र निकाला
जाय जिसका मुख्य उद्देश्य विद्यालय को लोकप्रिय बनाना और तत्सम्बंधी समाचारों को
सर्वसाधारण तक पहुँचाकर हितसाधन की चेष्टा तथा तद्र्थ सहाय्य प्राप्ति का उद्योग
हो। इसके अतिरिक्त मतसम्बंधी वितंडावादों से बचकर धार्मिक, सामाजिक और
शिक्षा विषय पर भी उस में लिखा जाया करे, हिंदी साहित्य की पूर्ति और सुधार भी
उस का प्रधान लक्ष्य हो। इत्यादि प्रयोजनों को सामने रखकर ‘भारतोदय’
का
उदय हुआ है। जैसा कि पत्रों में सूचना दी गई थी, 1 म (प्रतिपदा),
वैशाख
से पत्र निकालने का विचार था, परंतु कई अनिवार्य विघ्नों से पत्र
प्रतिज्ञात समय पर न निकल सका। जिस कारण अनेक भारतोदयाभिलाषी, सज्जनों
ने बड़े उत्कंठा और उत्साह भरे शब्दों में पत्र प्रकाशन के लिए अनुरोध किया और
इच्छा प्रकट की जिससे प्रकाशकों का उत्साह द्विगुणित हो गया। पत्र को रोचक और
उपयुक्त बनाने का यथाशक्ति प्रयत्न किया जाएगा। प्रसिद्ध विद्वान और कवियों के लेख
इसमें रहा करेंगे। बहुत से विद्वानों ने अपनी लेखमालिका द्वारा पत्र को अलंकृत करने
का प्रण कर लिया है, जिनमें से दो चार के नाम प्रकाशित किये जाते हैं। यथा-श्रीयुत
रावबहादुर मास्टर आत्मारामजी। श्रीमान् कविवर पण्डित नाथूराम शंकर शर्मा।
श्रीयुक्त प्रोफेसर पूर्ण सिंहजी इंपीरियल फारेस्ट केमिस्ट। श्री बा.गंगा प्रसाद
जी बी.ए., श्री बा. आशाराम जी बी.ए., श्री पं. रामनारायण मिश्र बी.ए.,
श्री
पं. रामचन्द्र शर्मा इंजीनियर, वैद्यराज श्रीकल्याण सिंह जी, श्रीस्वामी
मंगलदेव जी संन्यासी, इत्यादि।
पत्र का मूल्य बहुत ही कम। नाममात्र डेढ़ रुपए रखा गया है, इस
पर विद्यार्थियों को एक में ही दिया जायगा, और विद्यालय
कमेटी के मेम्बर मुफ्त पावेंगे। ऐसी दशा में ‘भारतोदयाभिलाषी’
महाशयों
का कर्तव्य है कि वे स्वयं इसके ग्राहक बनें और दूसरों को बनावें, जिन
सज्जनों के यहाँ अतिथि के रूप में ‘‘भारतोदय’’ पहुँचे, आशा
है कि वे अपनी आतिथेयता का परिचय देंगे और इसे विमुख और निराश न लौटाएंगे क्योंकि-
‘‘अतिथिर्यस्य भग्नाशो, गृहात्प्रतिनिवर्तते।
स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा, पुण्यमादाय गच्छति।।’’
भारतोदय का विषयवार अनुक्रम इस प्रकार था-
1. वेदमन्त्रार्थप्रकाश... वेदतीर्थ -
1
2. भारतोदय (कविता)....श्री पं. नाथूराम शंकर शर्मा - 4
3. सुखवाद...श्री मास्टर गंगाप्रसाद बी.ए. - 9
4. महिलामंडल....एक ब्राह्मण - 14
5. भ्रातृभाव...सहायक संपादक - 18
6. प्रकृतिस्तवः (संस्कृत कविता) ... श्री पं. भीमसेन शर्मा - 21
7. मेसमेरिज्म और संध्या... रा.ब.मा. आतमाराम जी - 22
8. महाविद्यालय समारंभ.... - 25
9. म.वि. समाचार, लोकवृत्त इत्यादि.... - 34
लोकवृत्त के अंतर्गत जो समाचार प्रथम अंक में प्रकाशित किएगए थे,
उनमें-
‘देशभक्त.. श्री अरविंद घोष, कवि अध्यापक और बैरिस्टर (प्रो. इकबाल
सम्बंधी), अमीर की उदारता (अमीर काबुल के प्राणहरण की साजिश सम्बंधी समाचार),
फ़ारस
और टर्की (दोनों राज्यों में ख़ूनख़राबी के बाद शांति सम्बंधी समाचार), जल
प्रलय (दक्षिण में 7-8 मई को 48 घंटे के अंदर 23 इंच पानी की बरसात से आई जलप्रलय
सम्बंधी समाचार हैदराबाद से प्राप्त हुआ था), सिंहल द्वीप
(सिलोन) में विश्वविद्यालय स्थापना का समाचार आदि समाचारों के अतिरिक्त अनेक
समाचार भी प्रकाशित किए जाते थे।
-ता. 11 मई की अमृत बाजार पत्रिका में किसी मुम्बई के व्यापारी महोदय के
टाइम्स आफ इंडिया में लिखे हुए लेख का सारांश छपा है। उससे ज्ञात होता है कि
अहर्निश स्वदेशी माल की ओर व्यापारियों का ध्यान आकर्षित हो रहा है। यह ज्ञात हुआ
है कि पूर्व वर्ष की अपेक्षा मुम्बई में डेढ़ लक्ष कपास के गट्ठे अधिक आए। जापान ने
290000 गट्ठे मँगाए। इससे बढ़कर स्वदेशी की कृतकार्यता का क्या प्रमाण होगा
कि 12 वर्ष पूर्व स्वदेशी माल पर टैक्स द्वारा ग्यारह लाख प्राप्त हुए थे।
आज उसी पर सरकारी आय 33 लक्ष हो गई है।
- अमेरिका में बिनौलों से घी बनाने के पचासों कारखाने हैं। अब समाचार
पत्रों में चर्चा है कि बम्बई में भी ऐसा कारखाना खुलने वाला है। (आशा है
दुग्धद्रोही ला. देवीदास जी आर्य यह सुनकर बहुत खुश होंगे)। भारतवर्ष का करोड़ों मन
घी परदेश चला जाता है। अब वह दिन आने वाला है जब बिनौलों का घी मिलेगा, अमेरिका
वालों की खूब बनेगी। स्वदेशी के प्रेमी उद्योग करें कि भारत का घी भारत ही में
रहे। परमात्मा इस नवीन घृत से बचावे।।
- पाश्चात्य विद्वानों के बुद्धिवैषद्य को देखकर आह्लाद हुए बिना नहीं
रहता, पेरिस में प्रसिद्ध अनुभवी ज्योतिष शास्त्र विशारदों की एक सभा होने
वाली है जिसमें आकाश के प्रत्येक भाग का चित्र खींचा जावेगा। आकाश के 22054
विभाग किए गए हैं। प्रत्येक भाग का पृथक् पृथक् चित्र रहेगा, तारे,
उनकी
गति व उनका स्थिति स्थान आदि का भी अद्भुत दृश्य रहेगा। ग्रीनिच की वेधशाला की ओर
से इसी विषय पर दो अद्भुत ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं जिनमें 19000
तारों का सचित्र वर्णन है। इस विषय में अन्वेषण करने के लिए अन्य वेधशालाएं भी
यत्न कर रही हैं।
- एक ज्योतिर्विद् का कथन है कि ये इतने असंख्य तारागण क्यों बनाए गए।
हमारे प्रकाश के लिए तो इन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जितना
चंद्रमा है उससे वह कुछ और बड़ा हो तो रात्रि का काम और भी अच्छा चल सकता है। हमको
वृथा संदेह में डालने के लिए कहें, तो ईश्वर का इसमें क्या प्रयोजन है।
इससे विदिता होता है कि तारे भी सूर्यवत् स्वतंत्र प्रकाश के गोलक हैं। और न जाने
क्या क्या है।
- मिलौनी नामक विद्वान् का कथन है कि चंद्रमा की किरणों में भी उष्णता
का कुछ अंश होता है। वेनिस, ल्फोरेन्स व पदना के वनस्पतिगृह में कई
विद्वान ने इस विषय में बहुत कुछ अनुभव करके देखा है (कहीं यह विद्वान शकुंतला के
दुष्यंत तो नहीं! उन्होंने भी चंद्रमा से अग्नि झड़ते देखी थी)
- रंगून के समाचार से विदित होता है दो जर्मन विद्वान पथिक मेकांग नदी
के स्रोत की खोज लगाने के लिए जा रहे थे, मार्ग में किसी दुष्ट ने उनको मार
दिया। वस्तुतः पाश्चात्य विद्वान ‘‘नाह्मस्मीति साहसं’’ इस
तत्व पर चलने वाले हैं। इसीलिए प्रत्येक कार्य में ऋद्धि व सिद्धि इनके सन्मुख हाथ
जोड़े खड़ी रहती हैं। इन दो महानुभावों का नाम ब्रनहेबर व हरस्क्मिट्ज है। ‘‘लिखे
जब तक जिए सफरनामे, चल दिए हाथ में कलम थामे।’’
- मिस्टर एफ. ड्यूक चीफ सेक्रेटरी बंगाल गवर्मेन्ट ने एक प्रसिद्ध
पत्रक निकाला है जिसमें पुलिस को दंगे फिसाद के मौके पर बंदूकें कैसी दागनी चाहिए
और फिसादी लोगों पर रोब डालने के लिये क्या करना चाहिए इसका वर्णन किया है। अब तक
सिर्फ डराने के लिए खाली बंदूकें छोड़ी जाती थीं अब सचमुच भरी हुई छोड़ी जावेंगे।
- लोकमान्य श्रीयुत तिलक भगवद्गीता पर कुछ लिख रहे हैं। गीता के भाग्य
खुले। देखें यह महापुरुष गीता पर क्या लिखते हैं। आपके दो सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘‘द
आर्कटिकहोम इन द वेदाज’’(1903), ‘ओरिअन’(1893) देखने योग्य
हैं-अगाध पांडित्य का प्रमाण हैं। आपका गीता भाष्य भी उज्ज्वल गुणों से उज्ज्वल
होगा।
- बड़ोदा राज्य में प्राथमिक शिक्षा बिना शुल्कादि लिए ही दी जाती है।
भारतवर्ष में यह एक ही स्टेट है जहाँ यह प्रबंध हुआ है। इस विषय में सरकार सोचते
ही सोचते रह गई। आज तक कुछ न कर सकी बड़ौदा महाराज ने इस प्रथा का प्रारंभ ही कर
डाला।
आर्य ‘सामाजिक समाचार’ भी अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित किए गए-
- गुरुकुल महाविद्यालय के उत्सव से लौटते हुए पं. गणपति शर्मा जी ने दो
व्याख्यान सहारनपुर में अत्यंत प्रभावशाली दिए। फिर वहाँ से दिल्ली पहुँचे,
और
वहाँ एक सप्ताह व्याख्यानों की धूम मचा दी, दिल्ली वासियों
पर उनका बहुत प्रभाव पड़ा।
- अप्रैल में गुरुकुल गुुजरांवाला का वार्षिकोत्सव बड़ी रौनक़ से हुआ।
धर्मचर्चा में भिन्न भिन्न मतवादी सम्मिलित हुए थे, अच्छा आनंद रहा,
म.वि.
से श्री पं. नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ भी पधारे थे। गुरुकुल गुजरांवाला में इस समय 57
ब्रह्मचारी प्रविष्ट हैं। 3200 के करीब धन एकत्र हुआ। श्रीमान ला.
रलारामजी का पुरुषार्थ प्रशंसनीय है।
- उसके पीछे आर्य समाज गुजरात (पंजाब) का उत्सव भी सानंद समाप्त हुआ।
हमारे मुख्याधिष्ठाता श्री पं. नरदेव जी वहाँ भी पधारे थे।
- 28.05.09 से 1-6 तक दिल्ली सदर आर्य समाज का उत्सव बड़े समारोह से होगा, 3
दिन धर्मचर्चा के लिए रक्खे हैं। उस पर श्री पं. गणपति शर्मा जी, श्री
पं. भीमसेन जी और श्री पं. नरदेव जी शास्त्री आदि अनेक विद्वान पधारेंगे।
अंत में ‘निवेदन’ किया गया
जिन सज्जनों ने ‘भारतोदय’ में समालोचना के
लिए पुस्तकें भेजी हैं उनसे प्रार्थना है कि अगली संख्या में समालोचना निकलेगी,
तब
तक संतोष रखें। जिन सहयोगियों की सेवा में ‘भारतोदय’
पहुँचे,
उनसे
विनय है कि इसके बदले में अपने अमूल्य पत्र भेजकर अनुगृहीत करें। ‘भारतोदय’
को
प्रथम अंक के बाद रजिस्ट्रेशन नं.। 476 प्राप्त हो गया। अगले अंक में यह नंबर
प्रकाशित किया गया।
‘भारतोदय’ का संघर्ष
‘भारतोदय’ सा.प.(साप्ताहिक प्रकाशन) वर्ष 1 पुनर्जन्म में
प्रकाशित इस लेख से पता चलता है-भारतोदय-इस नाम में कितनी जादू भरी है, यह
नाम चित्त को जितना आह्लाद् देता है, इस नाम से रह रहकर जिन जिन बातों की
याद आती है और याद कर कर जिस तरह जी भर आता है वह सब अनुभव करने की बातें हैं और
प्रत्येक भारतवासी स्वयं अनुभव कर ही रहा है। शब्दों से मानसिक स्थिति का घणान
अशक्य है। पर भारतोदय शब्द के अर्थ को प्राप्त करने के मार्ग में जो विकट घाटियाँ
हैं उनको पार करते करते कभी कभी जो निराशा छा जाती है, वह भी अवर्णनीय
है। पर सच्चे यात्री को यह निराशा स्वल्पकाल तक ही घेर सकती है। जिसकी दृष्टि
उद्दिष्ट स्थल पर लगी हुई है वह कब कठिनाइयों की परवाह करता है? वह
कब चैन लेता है? वह अपनों की हँसी मजाक भी सहता है, दूसरों की
मनमानी भी सहता है, और पार हो ही जाता है। जब घाटी पर चढ़कर नीचे देखने लगता है तब पहले
हँसने वाले लज्जा के मारे अपनी गर्दन झुका कर खड़े रहते हैं। ऐसे वीर पुंगव का आदर
करने लगते हैं, उसके पीछे चलना सीखते हैं। जो दशा असली भारतोदय के सम्मुख है वही दशा
काग़ज़ी भारतोदय के सम्मुख है। यह किस प्रकार मासिक रूप में निकला, फिर
साप्ताहिक हुआ, फिर कटारपुर के दंगल के समय घबराकर पूर्व प्रकाशक ने किस प्रकार बिना
सूचना दिए ही घर बैठे डिक्लेरेशन ख़ारिज कराया, किस प्रकार अनेक
विपत्तियों से महाविद्यालय की व संचालकों की जान बची, किस प्रकार फिर
उद्योग हुआ और प्रथम बार 1000 रुपए की व द्वितीयवार 2000 की
जमानत माँगी गई। इन सब बातों के लिखने की आवश्यकता नहीं। हम चाहते, तो
भारत भर में इस बात का हल्ला मचा देते पर महाविद्यालय के संचालक चुपचाप काम करना
ही अधिक पसंद करते रहे इस विश्वास पर कि कभी तो इन कठिनाइयों का अंत होगा। सुदीर्घ
परिश्रम के पश्चात् अब कहीं जाकर मुरादाबाद के कलेक्टर ने बिना जमानत ‘‘भारतोदय’’
के
प्रकाशन की आज्ञा दी है और इसीलिए अब यह आपकी सेवा में फिर पहुँच रहा है। इसको
अपनाइए, इसको पुचकारिए, इसकी सहायता कीजिए, इसका
उत्साह बढ़ाइए। इसकी अनुपस्थिति में महाविद्यालयों में भी युगांतर उपस्थित हो गया
था। उस युगांतर की राम कहानी लिखने का यह प्रसंग नहीं है। उनको याद कर जी भर आता
है। जिन्होंने भुगता वही जान सकते हैं कि युगांतर था, कि बला थी,
महाविद्यालय
के जीवन का प्रश्न था, कि मरण का। भगवान की कृपा से युगांतर आया व गया। बलाएं आईं और गईं
आगे की राम जाने। अब तक राम जी ने ही रक्षा की है। ‘चढ़ जा राम भली
करेंगे’-यही तत्व संचालकों के सम्मुख है। भारतोदय की पुरानी नीति उस समय की
उन उन परस्थितियों के कारण ‘स्वात्म-रक्षा’ था। चूँकि चौहूँ ओर की मारधाड़ और कॉम्प्लेक्स और क्रोएशिया संघटनों में उस नीति के बिना ' कॉलेज '
की रक्षा अप्रभावी थी। अब समय बदल गया , शत्रु और मित्रों का नजरिया भी बदल गया , इसलिए भारतोदय में आगे बेहुदा खंडन-मंडन को जगह नहीं मिली। रागद्वेषात्मक लेख रद्दी की टोकरी में पढ़ेंगे। समय की गति के अनुसार भारतोदय की नीति बनी रहेगी। प्रमुख भाग निःशुल्क प्राचीन शिक्षा का रहेंगे।
कुल मिलाकर पं. पद्मसिंह शर्मा जी द्वारा ' भारतोदय '
की शुरुआत हिंदी साहित्य और पत्रकारिता जगत में महत्वपूर्ण घटना है। पत्रिका में हिंदी , संस्कृत , उर्दू , अंग्रेजी शब्दों से कोई दायित्व नहीं रखा गया है। न ही किसी क्षेत्र में या किसी अन्य कंपनी से कोई भी कर्मचारी नहीं रखा गया है। भारतोदय संपूर्ण भारत की पत्रिका थी। उनका पाठक वर्ग बड़ा विशाल था।
संदर्भ पाठ
1. भारतोदय का प्रथम अंक
2. भारतोदय सप्ताह का पुनर्जन्म
3. गुरुकुल महाविद्यालय की स्मृति (हीरक जयंती)

सुन्दर प्रयास
ReplyDelete