संपादकाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा ने हिंदी-पत्रकारिता के दधीचि थे , 44-45 वर्ष के हिंदी समाचारपत्रों का संपादन, अपनी अस्थियों को जला दिया। इस दीर्घकालीन साधना में उनके सामने कैसी-कैसी कठिनाइयाँ आईं , उनकी झलक हमें उनके द्वारा लिखित ' मेरे अनुभव' से प्राप्त होती है। उनका अंतिम समय बड़े पैमाने पर हुआ। जीवन के अंतिम समय में उनके पास भोजन और औषधि के लिए भी पैसे नहीं थे। पं. बनारसीदास के शब्दों में ' वे तीन अर्थों में भूखें मर गए ' । 21 नवम्बर 1918 को आगरा में उनके निधन पर ' मुसाफिर ' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई , जिसमें ' हमें , पं. ' लिखा गया था। रुद्रदत्त जी को उनकी अंतिम बीमारी के नाम पर पैसे-पैसे को मोहताज देखकर बड़ा दुख हुआ। '
पं. रुद्रदत्त शर्मा कभी एक जगह पर बंदकर नहीं रहे। इससे उनके रूमानी और मनमौजी स्वभाव का पता चलता है। उन्होंने अलग-अलग स्थानों से अखिल भारतीय स्मारकों का एक संस्करण प्रकाशित किया और उससे भी अधिक अभिलेखों का संपादन किया। यथा-
इंद्रप्रस्थ प्रकाश (दिल्ली) , आर्य विनय (मुरादाबाद) , भारतमित्र (कलकत्ता) , हिंदी बंगवासी (कलकत्ता) , भारतरत्न (पटना) , श्रीवेंकटेश्वर समाचार (बंबई) , आर्यमित्र (आगरा) , प्रेम (वृंदावन) , सत्यवादी (हरिद्वार) , हितवात्र (कलकत्ता) , मारीजी (नागपुर) , मालवा समाचार (देवास) आदि।
पं. रुद्रदत्त शर्मा न केवल पत्रकार बल्कि एक महान साहित्यकार , अनारक्षित और प्रहसन-लेखक भी थे। उन्होंने ' स्वर्ग में सब्जेक्ट कमेटी ', ' स्वर्ग में महासभा ' और ' कांथी जनेऊ का विवाह ' लिखा , जिससे उन्हें अपने समय में अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
ये त्रिप्रहसन पं. रुद्रदत्त ग्रंथावली (भाग 1) प्रकाशित हैं। इसके संपादक हैं , डॉक्टर. भवानीलाल जी भारतीय। ' पुराण परीक्षण ', ' योगदर्शन ' और ' ध्यान योगशास्त्र' में पंडितजी का धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप उभर कर सामने आया है। ' आर्यमत मार्तण्ड ' और ' मनोरंजन ' उनके लिखे नाटक हैं तथा ' वीरसिंहबाबा ' और ' जर्मन जासूस ' उपन्यासों की भी वे रचनाएँ करते थे। शिक्षाशास्त्र पर वे ' शिक्षा विज्ञान ' ग्रंथ की रचना है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य जी ने नाटक , उपन्यास , धर्म-दर्शन , शिक्षा , विज्ञान आदि विभिन्न विधाओं में साहित्य-रचना की। दुख की बात है कि हिंदी-साहित्य के इतिहास-ग्रंथों में उच्चांश परंपरा-ग्रन्थों से उनकी कृतित्व की सर्वथा का अनावरण किया गया है ।
आचार्य जी की मृत्यु लगभग दो वर्ष पूर्व हुई। बनारसीदास चौधरी का आग्रह हिंदी-पत्रों के इतिहास और इसके दूसरे भाग में अपना अनुभव आरंभ करना था। दुर्भाग्य से वे अपूर्ण ही रह गये और आद्यपूर्णता अप्रकाशित हो गये। श्रद्धेय एसोसिएट जी के सौजन्य से ये मुझे प्राप्त हुए और इसके कुछ अंश रेस्तरां टाइम्स ऑफ रिपब्लिक स्पेशल 66 में प्रकाशित किए गए थे।
पं. जी बहुत समय तक आर्य समाज के उपदेश देते रहे और उनके शास्त्रार्थों में भाग लेते रहे। शास्त्रार्थों में वे प्रसिद्ध आर्यसंन्यासी स्वामी दर्शनानंद जी के साथ थे।
पं. रुद्रदत्त शर्मा को अपने स्नातक में आर्यविद्वत्सभा के ' आचार्य ' के अतिरिक्त कोई भी उल्लेखनीय सम्मान प्राप्त नहीं हुआ। सन 1971 ई. हिंदी साहित्य सम्मेलन के आदर्श मंच के अवसर पर पं. पीयू सिंह शर्मा ने गुरुकुल कॉलेज आतिशपुर के मुखपत्र ' भारतोदय ' में हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद के लिए पं. रुद्रदत्त शर्मा का नाम प्रस्तावित था , वैज्ञानिक विद्यामंडली ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
पं. बनारसीदास चौधरी ने नेपोलियनाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा की जीवनी पर विचार। इसके लिए सामसामयिक सामग्रियां भी लें। पं. पी ù सिंह शर्मा भी इसके लिए विशेष प्रयास थे। उन्होंने पी.एन. बार-बार में उनके द्वारा लिखित बार-बार का उल्लेख किया गया है। अन्य समय के चक्र से यह जीवनी भी पूरी न हो।
पं. पी. सिंह शर्मा नेचार्य की मृत्यु 17 मार्च 1918 ई.) उनके कार्यालय में कहा गया था-
जब तक ख़बरनामे लिखा
नीचे दिए गए चल हाथ में क़लम था
जीवन के अंतिम समय तक क़लम घिसने वाले उस महान पत्रकार को हमने भुला दिया। यह सामान के अतिरिक्त और क्या कहा जाये।
पं. रुद्रदत्त शर्मा का जन्म मार्गशीर्ष त्रयोदशी सं. 1911 वि. (1854 ई.) कैसलो को धामपुर जिले में स्थित स्थान पर रखा गया था , जहां उनका कोई विशेष स्मारक नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से धामपुर के कुछ उत्साही युवा , पत्रकार एवं गुलाम पं. रुद्रदत्त जी की जन्मतिथि पर धामपुर में कुछ कार्यक्रम होते हैं। धामपुर के विद्वान पत्रकार संघ , हिंदी साहित्य परिषद और प्रेस क्लब के तत्ववधान में जापानी स्मृति-रक्षा के प्रयास चल रहे हैं। यथा- धामपुर का नाम श्री रुद्रधाम रखा गया तथा धामपुर में पं. रुद्रदत्त शर्मा की स्मृति में एक पुस्तकालय की स्थापना हुई। कुछ शुभकामनाओं में उन्हें सफलता भी मिली है।
आशा है कि सभी सम्मिलित सत्प्रयासों से धामपुर में पंडित रुद्रदत्त शर्मा की स्मृति में शीघ्र ही कोई प्रतिष्ठित एवं उपयोगी स्मारक संस्था होगी।

No comments:
Post a Comment