Thursday, November 6, 2025

संपादकाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा




 

हिन्दी पत्रकार-कला का पिछला सवासौ साल का इतिहास कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा है। हालाँकि उनके बारे में सूखे विवरण में सूक्ष्मता पर लेख और निबन्ध लिखे गए हैं , तथापि वह अब भी नाटकीय रूप से जीवित रह रहे हैं जैसे कि सजीव कलाकार की , जो उनके सूखे अवशेषों में जान डाल के आकर्षण हैं , जो उस नाटक को हमारी आँखों के सामने चित्रित कर सकते हैं। हमारे बीसियों चित्रों के आत्मत्याग और बलिदानों की स्फूर्तिप्रद कथा के अवशेष रखे गए हैं , जिनमें कई जीवन चरित्रों और तीर्थों की रेखा-चित्रों का मसाला शामिल है। ऐसी सैकड़ों घटनाएँ हैं जो भारतीय पत्रकार-कला के इतिहास में स्थान पा सकते हैं। बाबू बालमकुंड गुप्ता का इस आधार पर नौकरी से अलग जाना जाता है कि वे हिंदोस्तान में ' गवर्मेंट के विरोध में ' कठोर लेख की दुकान हैं , बालकृष्ण भट्ट का अपने हॉट विचारों के नौकरी कारण से स्नातक , महावीर प्रसाद प्रसाद का सौ रुपये की सेवा के लिए बीस महीने की सेवा छूट ' सरस्वती ' का संपादन और शंकर संप्रदाय का संप्रदाय विशेष घटनाएं हिंदी पत्रकारिता-कला के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएंगी। हमारे पथप्रदर्शक पुजारियों ने जिन-जिन समूहों के बीच में काम किया है , उनका वर्णन हमारे लिए प्रोत्साहनप्रद तो होगा ही , साथ ही हममें कृतज्ञता के भाव को भी जाग्रत करना होगा। श्राद्ध भारतीय संस्कृति का एक विशेष गुण है और उसकी भावना को जीवित और जागृत बनाए रखना-की आवश्यकता है।

ऐसे ही हिन्दी-पत्रकारों का जीवन शिष्टता ही रह रही है और अब भी उनकी स्थिति में विशेष सुधार नहीं हो पाया है , फिर भी जैसे कि , आचार्य रुद्रदत्त जी को अपने अंतिम दिनों में भोगने पड़े , वैसे ही शायद किसी अन्य हिन्दी पत्रकार को भोगने पड़े ही। वे शास्त्रीय भूख मर गए! और उनकी यह दुर्बलता मृत्यु के लिए आर्य समाज और हिंदी जगत के समान रूप से स्पष्ट है।

चालीस-पेंटालिस वर्ष तक साहित्य-सेवा तथा हिन्दी-पत्रों का संपादन करने के बाद औषधि , पथ्य तथा भोजन के लिए तरस-तरस कर प्राण गँवाना , यह अकथा दुर्भाग्यवश था। संस्कृत के उस महान विद्वान , आर्य समाज के महोपदेशक तथा शास्त्रार्थकर्ता और हिन्दी के उच्चकोटि के लेखक तथा पत्रकार का , जिनका संपूर्ण जीवन ही जनता को शिक्षित करने में बीता था!

 

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' बधाई जी , मेरी एक शिकायत का अंग्रेजी में अनुवाद करें। '

एक दिन के संपादक पंचाचार्य. रुद्रदत्त जी ने घर पर ज्ञान दिया।

बात सन 1917 की है. तब मैं इंदौर के डेली नॉच में हिंदी शिक्षक थे और शिक्षक जी भी उन दिनों इंदौर में ही थे। जो प्रार्थनापत्र वे लिए लाए थे , उन्हें हम ज्यों-का-त्यों उद्धृत करते हैं-

' सेवा में श्रीमन्महोय प्रधान मंत्री , इंदौर राज्य।

श्रीमान्मान्यवर सर ,

बहुमान पुरसर वर्ष से अनुरोध है कि मैं 40 वा 45 से हिंदी साहित्य की सेवा कर रहा हूं और तीन अवसरों में मुझे ऐसा अनुभव भी प्राप्त हुआ है कि मैं प्रतिदिन , साप्ताहिक और मासिक साहित्य रचनाओं के अतिरिक्त साहित्य का संपादन भी उत्तमता के साथ कर सकता हूं , क्योंकि मैं अंग्रेजी , बांग्ला , गुजराती और संस्कृत-लेखों का अनुवाद हिंदी भाषा में कर सकता हूं

इसी पूर्व में श्री महाराज देवास (छोटी पाँटी) की सेवा में थे और वहाँ पर उन्होंने गंगा-निर्माण का काम किया था , उस पोस्ट के रिडक्शन में एक जाने से मुझे देवास त्यागना पेड , हालाँकि उक्त उक्ति श्रीमंत देवास नरेश्वर ने मुझसे कृपापूर्वक ' मालवा समाचार ' नामक साप्ताहिक पत्र की संपादक की पेशकश की थी , लेकिन उनका वेतन ( वेतन ) इतना कम था कि मैं परिवार का पालन-पोषण नहीं कर सका।

देवास देशाधिपति महाराज की सेवा में पूर्व में वृन्दावन के ' प्रेम ' नाम के साप्ताहिक पत्र का संपादक था।

मैंने अपने जीवन में नीचे लिखा समाचार राजनेताओं की सफलता से संपादित किया गया है -

इंद्रप्रस्थ प्रकाश , दिल्ली                 1 वर्ष

भारतमित्र , कलकत्ता साप्ताहिक एवं दैनिक   10

आर्यावर्त्त , कोलकाता                   10

हिन्दी बंगवासी                       2

भारतरत्न , पटना                      2

श्री वेंकटेश्वर समाचार , बम्बई           1

आर्यमित्र , आगरा                    6

सत्यवादी , हरद्वार                    1

हित वार्तालाप , कोलकाता              2

प्रेम , वृन्दावन                       2

मारवी , नागपुर                     2

पत्र-संपादन के अतिरिक्त मेरे बनाये बहुत से ग्रंथ भी उदाहरण हैं , जैसे-

- सांख्यशास्त्र का हिंदी अनुवाद।

- योगशास्त्र और व्यासभाष्य का हिंदी अनुवाद

- वीरसिंहबाग (उपन्यास)

- मनोरंजन (नाटक)

-स्वर्ग में विषय समिति (प्रहसन)

- स्वर्ग में महासभा (प्रहसन)

- ध्यान विधि योग

- शिक्षा-विज्ञान इत्यादि।

आजकल मैं जर्मन जासूस नामक उपन्यास लिख रहा हूं , जिसका नमूना इस प्रार्थनापत्र के साथ दिया गया है।

यदि मेरी साहित्य सेवा और दशा पर विचार करके श्रीमान कोई सेवा प्रदान करेंगे तो मैं श्रीमानों का जन्म कृतज्ञ बना रहूँगा।

श्रीमानों का आज्ञानुविद्या

सेवक

रुद्रदत्त ''

 

आचार्य जी के आदेश पर मैंने अंग्रेजी में उनकी आपत्तियां लिखीं। हालाँकि सन 1910 में उनके दर्शन किये गये थे , जबकि वे आर्य समाज फिरोजाबाद के उत्सव पर पधारे थे , उनकी सेवा में आर्य मित्र कार्यालय (आगरा) में भी शामिल हुए थे और उनके सिवाए कई वर्षों से उनकी भाषा-शैली के प्रशंसक भी थे ( ' स्वर्ग में सब्जेक्ट समिति ', ' स्वर्ग में महासभा ' और ' कंठी जनेऊ का व्या ' का पारायण न जाने कितनी बार किया गया था!) ​​और उस समय तक मुझे यह बात पता नहीं थी। पत्रकार-कला के लिए उन्होंने कितनी गहरी साधना की है।

उस दिन श्रद्धेय पंडित जी को अंतिम स्थिति में देखकर दिल को बड़ा झटका लगा। बंधुवर द्वारिकाप्रसाद जी सेवक से इतना तो मुझे पता चला कि पांच महीने की जेल के लिए पंडितजी को तीन मील तुकोगंज आना-जाना है!

एक दिन शाम के वक्त मैं उनकी जगह पर भी आया। नीचे किसी सुनार की दुकान और उसके ऊपर एक छोटी सी फैक्ट्री में , जिसकी दुकान में तीन महीने की दुकान थी , पंडित जी दुकानदार थे और दो पैसे की एक टीन के लैंप के धुंधले प्रकाश में कुछ लिख रहे थे! उन दिनों पंडितजी को भोजन का भी शौक था। चालीस वर्ष की हिन्दी साहित्य-सेवा के बाद किसी विद्वान की यह दुर्गति हो सकती है , इसकी कल्पना मैंने स्वप्न में भी नहीं की थी। पंडित जी की सेवा में मैंने अनुरोध किया , ' आप हिंदी पत्रकार कला-सम्बन्धी अपने अनुभव लिखें। संभवतः कुछ मिल जायेगा। '

पंडित जी ने अनुभव इंजीनियर की नियुक्ति की। आशा थी कि एक हिन्दी-संस्था ने उन्हें कुछ बेवकूफ़ बना दिया , लेकिन दुर्भाग्य से उस संस्था के महासचिव ने उन्हें अस्वीकृत कर दिया! अतएव जो यत्किंचित सेवा मेरे बन पड़ा , कर दी। पंडितजी को इंदौर में कोई काम न मिल सका और वे आगरे लौट आए।

17 मार्च 1919 को उनका स्वर्गवास हुआ। मुसाफ़िर (आगरा) ने अपने 21 रन के अंक में लिखा था -

' हमें पंडित रुद्रदत्त जी को उनकी अंतिम बीमारी के नाम पर पैसे-पैसे को मोहताज देखकर बड़ा दुख हुआ, पंडित जी की मौत के पहले दो-तीन माहा बुखार और पेचिस के मर्ज में मुबताला रहे और इस लज़ीज़ सती के अय्याम में उनकी आर्थिक दशा यह रही कि हकीम , डॉक्टरों की जेब तो दर किन्नर , दवा तक के लिए उन्हें पैसा मुआसर न था। '

सन 1875 से 1918 तक 44 वर्ष तक साहित्य-सेवा एवं संपादन कार्य करने का यह पुरस्कार था। इस दुःखांत नाटक में सबसे अधिक उल्लेखित भाग एक गरीब कंपोजिटर का है , जिसने अपने पास से आटा खरीदकर अपने घर पर दे दिया था।

सौंदर्य विवरण और कुछ अनुभव

पं. रुद्रदत्त जी का जन्म धामपुर जिले के त्रयोदशी संवत 1811 ( सन् 1854) में मार्गशीर्ष पर हुआ था। उनके पूज्य पिता पं. शशिनाथ जी (पं. काशीनाथ जी को आप शशिनाथ लिखते हैं तो ऐसे दिखते हैं) संस्कृत के महान विद्वान और ज्योतिष के पूर्ण पंडित थे। रुद्रदत्त जी की ऐतिहासिक संस्कृत-शिक्षा घर पर हुई। अपने चाचा जी के साथ वे वृन्दावन , मथुरा , और काशी नामक स्थानों पर विद्यापर्जन करने चले गये। 21 वर्ष की अवस्था में आप घर पर रुकें और कुछ दिन अंग्रेजी में पढ़ें। अर्थशास्त्र और अर्थशास्त्र में आर्य समाज के उपदेशक के पद पर काम किया। फिर उनका संपादन पत्र का कार्य-अभिनेता हुआ , जो कलाकार-कार्यकर्ता रहा।

परिस्थिति परिस्थिति

उस युग के संपादकों को हार्ड रिंक्ला में काम करना था , आज हम उनकी कल्पना भी नहीं कर सकते। श्रीलक्ष्मीकांत जी भट्ट (श्रीकृष्ण बालकृष्णजी भट्ट के सुपुत्र) ने हमें बताया था , ' जब एक लाख पांच साल (हिंदी प्रदीप की वार्षिक कीमत) कहीं से आ जाती थी तो हमारे घर में घी आता था। ' पत्र विक्रेता सेठ-महाजन होते हैं और जो व्यवहार शिक्षक के प्रतिनिधि होते हैं वह नितांत असन्तोष जन और काल्पनिक विकसन थे और सरकार भी देशी भाषा के दिग्गजों को विचारधारा की दृष्टि से विकसित करती थी। ' आर्य विनय ' ( अग्रणी) के अपने पादुका के विषय में पं. रुद्रदत्त जी ने लिखा था-

' एक समय तलाक के शहर हाल में आर्य समाज की ओर से एक ऐसी सभा हुई जिसमें तलाक के आरोपियों के अतिरिक्त बच्चे भी शामिल हुए थे। इस सभा में आर्य समाज की ओर से कोई वेद मंत्र नहीं पढ़ा गया था। इस संपादक की ओर से समाज पर आक्षेप ' आर्य विनय ' प्रकाशित हुआ था। इस समाज के बहुत-से वैज्ञानिक संपादक से रुष्ट हो गए , हालांकि संपादक ने ' आर्य विज्ञ ' के इस मोटो (सिद्धांत) वचन के कथन के अनुसार आक्षेप किया था ' शत्रोपरि गुण वाच्य दोषो वाच्या गुरुरपि ' अर्थात शत्रु के भी गुण और अपने गुरु के भी दोष को प्रकाशित कर देना चाहिए। इस पत्र का प्रत्येक अंक मुझे डिप्टी रामदेव साहब को सुनाने जाना था। इस प्रकार से कई वर्षों तक मैंने इस मासिक पत्र को जारी किया था। '

एक बार पं. रुद्रदत्त जी पर सरकार की ओर से मुकदमा चलाने का संकट पैदा हो गया था , लेकिन हिंदी के सुप्रसिद्ध सेवक ग्रियर्सन साहब ने , जो उन दिनों पटना के कमिश्नर थे , उनकी रक्षा की थी।

' भारत सरकार जब असली सीक्रेट एक्ट पास करके चली थी , तब मुझे भारत मित्र , बंगवासी और हिट धारावाहिक के संपादन कार्य से अवकाश मिला था और ' आर्यावर्त ' सप्ताह पत्र में दानापुर समेत सारी सामग्री चली थी। एक बार मैं दानापुर से जनकपुर गया था। जेनकेपुर नेपाल राज्य की सीमा रेखा है।

' जनकपुर से दस-बारह कोस आगे तक चला गया। आस-पास में एक बाउण्ड्री चौकी के बारे में कई अद्भुत बातें देखने को मिलीं। एक चैकी में लगभग सौ गोरे सोल्जर और 200 बिहारी चैकीदार और कुली देख पड़े। मैं रात को जागा और रास्ते से थका हुआ था , अताव विश्राम करना चाहता था , लेकिन थोड़ी ही देर बाद एक नेपाली सिपाही आया और उससे मिलने लगा कि आपको सैंचुरीदार साहब बुलाते हैं। उठा में , सिपाही के साथ नेपाली सरहद की चौकी में पहुंचे....वहां जाके देखा कि एक गौर वर्ण का मोटा ताजा घोड़ा तेज आदमी पलंग पर चढ़ गया है। उस बूढ़े इंसान ने मुझसे नाम-धाम और आने का कारण पूछा.... फिर उस इंसान ने मुझसे पंडित को बुलाया 5 रुपये दक्षिणा देके सरहद तक पहुंचा दिया... खैर इन तमाशों को देखकर मैं दानापुर लौट आया और कल्पित नवन्यास की रीति पर आर्यावर्त में एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख के प्रकाशित होने ही बड़ा कोलाहल मचा। कलकत्ते की अदालत से उस लेख का अंग्रेजी अनुवाद होके पटने की पुलिस में आया और पुलिस के अधीक्षक साहब दानापुर आके आर्यावर्त प्रेस से फाइल आदि ले गए। जब सब प्रकार से अभियोग प्रवाह का ठीक-ठाक हो गया तब स्वर्गवासी बाबू रामदीन सिंह जी ने मुझे साथ लेकर कमिश्नर साहब के पास गए और समझाया कि यह लेख कुछ नहीं , वरन् देवी भागवत में जो प्रह्लाद और नर-नारायण के युद्ध की कथा है , उसके आधार पर यह नवन्यास लिखा हैआप जाइये , सरकार से इस पर अभियोग नहीं चल सकता , क्योंकि आपने मार्कण्डेय पुराण के श्लोकों से अपना लेख मिला दिया है। इन कमिश्नर का नाम ग्रियर्सन साहब था। '

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पंडित जी के स्वभाव में विचित्र मनमौजीपन था। श्रीबाबूराम शर्मा रसवैद्य ने अपने एक लेख में लिखा था- दीर्घसूत्रता के साथ पंडितजी का सूक्ष्म शरीर था। पत्र के लिए प्रति सप्ताह ठीक समय पर कापी दे उनके लिए लोल्या असम्भव बात थी , इसलिए प्रेस मैनेजर (प्रबंध लेखक) से उनकी याददाश्त कम हो गई थी , लेकिन यह मोक्ष वाग्युद्ध क्षणस्थायी ही हुआ था....

.... पंडितजी ने अर्थ संग्रह को कभी भी अपने जीवन का उद्देश्य नहीं बनाया। जहां वे बच्चों को पूर्ण करने में निसानकोच भाव से द्रव्य का व्यय कर रहे थे , वहां शेयरों को अलग-अलग-पिलाने में बड़ी उदारता से काम लेते थे और ऐसा करने में परमानंद का अनुभव करते थे। अपने हाथ से अँगीठी पर विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्रियाँ प्रस्तुत करके अपने इष्ट मित्रों को सम्मिलित रूप से उन्हें अतिउत्साह दिया गया था और इसके साथ या तो शेरखानी जारी की गई थी , या संस्कृत के उद्धरण श्लोकों का पाठ या कोई धार्मिक , सामाजिक या ऐतिहासिक संदर्भ दिया गया था।

उनकी चित्त में बड़ी दया थी। किसी ने उन्हें देखकर एक सामान्य सी बात बताई। सामान्य से सामान्य स्थिति के लोगों के दुःख-दर्द में शामिल होकर उनका प्रतिकार-संस्मरण की चेष्टा करना उनका स्वभाव था। ऐसे कोमल हृदय , करुणाशील और परोपकारी सज्जनों को अपने अंतिम दिन बड़े ही आग्रह और यातन में आरंभ करने पड़े , इससे अधिक खेद की बात और क्या हो सकती है! '

एक प्रस्ताव

आर्य समाज के नेताओं से तथा हिन्दी जगत के धनीधोरियों से हमारी प्रार्थना है कि यदि वे और कुछ न कर सकें तो स्वर्गीय पं. रुद्रदत्तजी के कुछ निबन्धों को उनके स्मरणों के साथ पुस्तककार में पापा ही दे दीजिए। हजार-बारह में सौ का खर्च।

जिस व्यक्ति ने 44-45 वर्ष तक अपनी वाणी और लेखनी से हिंदी दुनिया और आर्यजगत का इतना हित किया और जिसने अंत में भूखों मरना शुरू कर दिया , उसकी स्मृति-रक्षा के लिए हम इतने भी न कर सके ?


बनारसीदास चतुर्वेदी


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